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नाच्यौ बहुत गोपाल यशस्वी साहित्यकार अमृतलाल नागर का, उनके अब तक के उपन्यासों की लीक से हटकर सर्वथा मौलिक उपन्यास है। इसमें 'मेहतर' कहे जानेवाले अछूतों में भी अछूत, अभागे अंत्यजों के चारों ओर कथा का ताना-बाना बुना गया है और उनके अंतरंग जीवन की करूणामयी, रसार्द और हृदय झांकी प्रस्तुत की गई है। 'मेहतर' जाति किन सामाजिक परिस्थितियों में अस्तित्व में आई, उसकी धार्मिक सांस्कृतिक मान्यताएं क्या है, आदि प्रशनों के उत्तर तो दिए ही गए हैं, साथ ही वर्तमान शताब्दी के पूर्वार्द्ध और सामाजिक हलचलों का दिग्दर्शन भी जीवंतता के साथ कराया गया है। वस्तुतः "नाच्यौ बहुत गोपाल" की कथा का संगुम्फन एक बहुत व्यापक कैनवास पर किया गया है। ढाई-तीन वर्षों के अथक परिश्रम से, विभिन्न मेहतर-बस्तियों के सर्वेक्षण व वहां के निवासायों के 'इंटरव्यू' के आधार पर लिखी गई इस बृहत औपन्यासिक कृति में नागरजी के सहृदय कथाकार और सजग समाजशास्त्री का अदभुत समन्वय हुआ है।
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