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उड़िया भाषा की प्रतिभासम्पन्न लेखिका प्रतिभा राय के उड़िया उपन्यास "शिलापदम" को "ओड़ीसा साहित्य अकादमी पुरस्कार"-1986 प्रदान किया गया था। उसी उपन्यास का हिन्दी रूपान्तर "कोणार्क" के रूप में प्रस्तुत है।
यह कोई इतिहास नहीं है, यहां इतिहास-दृष्टि भी प्रमुख नहीं है-साहित्य सृष्टि ही इसके प्राणों में है। इस कृति में केवल पत्थरों पर तराशी गई कलाकृतियों का मार्मिक चित्रण नहीं है। उड़िया जाति की कलाप्रियता और कलात्मक ऊचाइयों की ओर संकेत करते हुए लेखिका ने उस कोणार्क मंदिर को चित्रित किया है जो आज भारतीय कला-कौशल, कारीगरी एवम् आदर्शों के एक भग्न स्तूप है।
शिल्पी कमल महाराणा और बधू चंद्रभागा के त्याग, निष्ठा, उत्सर्ग, प्रेम-प्रणय-विरह की अमरगाथा को बड़े सुन्दर ढंग से इस प्रशंसित और पुरस्कृत उपन्यास में प्रस्तुत किया गया है।
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