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सोमनाथ की ऎतिहासिक लूट और पुनर्निर्माण की कहानी को आचार्य चतुरसेन ने इस उपन्यास में बड़े ही रोचक ढंग से प्रस्तुत किया है। सोमनाथ का मंदिर सैकड़ों देवदासियों के नृत्यों से, उनके घुंघरूओं की ध्वनि से सदा गुंजित रहता था। देश-देशान्तर के राजा और रंक इसके वैभव के समक्ष नतमस्तक होते थे। फिर भी एक विदेशी द्वारा इसे ध्वस्त करने का दुस्साहस किया गया। इतिहास की इस विडंबना को आचार्य चतुरसेन ने औपन्यासिक शैली में बांधा है।
प्रभासपट्टन स्थित सोमनाथ मंदिर भारतीयों की धर्म परतयणता का जीवंत प्रमाण है। विदेशी आक्रमणकारियों ने इसके वैभव से प्रभावित होकर अनेक बार इस मंदिर को लूट़ा और ध्वस्त किया। महमूद गज़नवी सोलह बार यहां की धन-सम्मपत्ति को ऊटों पर लादकर ले गया, परन्तू फिर भी इसका अस्तित्व समाप्त नहीं हुआ।
गहन अध्ययन और उस क्षेत्र के विस्तृत सर्वेक्षण के आधार पर लिखा गया यह उपन्यास, इतिहास का जीवंत दस्तावेज है।
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