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सोना पूंजी का प्रतीक है और खून युद्ध का। युद्ध प्रायः पूंजी के लिए होते हैं और पूंजी से ही लड़े भी जाते हैं। 'सोना और खून' पूंजी के लिए लड़े जाने वाले एक महान युद्ध की विशाल पृष्ठभूमि पर आधारित ऎतिहासिक उपन्यास है, आचार्य जी का सबसे बड़ा उपन्यास है। इस उपन्यास के चार भाग हैं : 1. तूफान से पहले 2. तूफान 3. तूफान के बाद 4. चिनगारियां। ये चारों भाग मुख्य कथा से सम्बद्ध होते हुए भी अपने में पूरण स्वतन्त्र हैं।
भारत में अंग्रेजी राज स्थापित होने की पूरी पृष्ठभूमि से आरम्भ होकर स्वतन्त्रता-प्राप्ति तक सारा इतिहास सरस कथा के माध्यम से इसमें आ गया है। इसमें आचार्य जी ने प्रतिपादित किया है कि 'भारत को अंग्रेजों ने नहीं जीता और 1857 की क्रान्ति राष्ट्रीय भावना पर आधारित नहीं थी।' साथ ही 'वतन की स्वतन्त्रता प्राप्ति पर उस क्रान्ति का कोई प्रभाव नहीं पड़ा।'
यह उपन्यास एक अलग तरह की विशेषता लिए हुए है। इतिहास और कल्पना का ऎसा अदभुत समन्वय आचार्य जी जैसे सिद्धहस्त कलाकार की लेखनी से ही सम्भव था।
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